आत्मा और परमात्मा के मिलन ही महारास है …. सुश्री नारायणी तिवारी।
आत्मा और परमात्मा के मिलन ही महारास है …. सुश्री नारायणी तिवारी।
Surya news 24,बगहा।बगहा नगर के सनफ्लावर चिल्ड्रंस एकेडमी पटखौली मलकौली बगहा-02 के प्रांगण में जनमानस के सहयोग से आयोजित साप्ताहिक श्रीमद् भागवत ज्ञान यज्ञ के छठवें दिन सुश्री नारायणी तिवारी ने भगवान श्री कृष्ण द्वारा शरद पूर्णिमा को आयोजित महारास की कथा सुनाएं ।कथा वाचिका ने कहा कि महारास श्रेष्ठ आत्माओं का परमात्मा में मिलन का नाम है। इस महारास की बहुत दिनों से चाह गोपियों को थी। क्योंकि गोपियां भगवान के बिरह में निरंतर आशु धारा बह रही थी। तभी भगवान ने सभी गोपियों को बांसुरी बजाकर महारास के लिए निधिवन में बुलाया। लेकिन निधिवन पहुंचकर जब गोपिया अपने को अहम् के वशीभूत कर ली कि मेरा कृष्ण मेरे पास है और कृष्ण मुझे छोड़कर नहीं जा सकते। अहंकार आते ही भगवान गोपियों को छोड़कर अन्तर्ध्यान हो गए। स्वयं राधा जी को भी छोड़कर भगवान दूर हो गए। राधा भी रोने लगी। लेकिन जब उनके मन से अहंकार का भाव दूर हुआ भगवान शीघ्र प्रकट हो गए ।गोपिया भगवान क्षमा मांगने हैं और जब भगवान ने देखा कि गोपियों का मन निर्मल हो गया है। तब महारास शुरू हुआ ।बाद में भगवान भोलेनाथ भी माता पार्वती के साथ महारास में हिस्सा लेने के लिए आए। और तब कथा वाचिका जीत गया कि *आत्मा का परमात्मा से मिलन का यह आश है ।यही महारास है* जिसमें भक्त झूमते नजर आए। महारास यह शिक्षा देत है कि जब तक जीवात्मा के अंदर अहंकार व्याप्त होता है।तबतक उसकी मुलाकात परमात्मा से उसकी नहीं होती है। महारास से पहले भगवान श्री कृष्ण ने बांसुरी बजाकर गोपियों का आवाहन किया।कंस द्वारा अक्रूर को भेज कर कृष्ण को मथुरा बुलवाया गया। भगवान परसों लौट आऊंगा वादा करके मथुरा आए । जहां कुबजा को स्पर्श कर सुंदर शरीर प्रदान किए।वहीं कंस के हाथी कंस के परिकरों सहित कंस को का उद्धार किए ।अपने माता-पिता और अपने नाना जी को कारागार से मुक्त किए ।पश्चात माता-पिता की आज्ञा से भगवान कृष्ण और बलराम उज्जैन पढ़ने के लिए गए ।शिक्षा समाप्ति के पश्चात वापस आने पर बलराम जी की शादी होती है । अचानक एक दिन भिष्मक की पुत्री रुक्मणी का पत्र भगवान श्री कृष्ण को मिलता है । रुक्मणी का भाई रुक्मिण माता रुक्मिणी का विवाह शिशुपाल से करना चाहता था । जो माता को पसंद नहीं था । अतः अपनी करुणा भरी आग्रह पत्र भगवान श्री कृष्ण के पास भेजवाई । भगवान श्री कृष्ण माता को लेने के लिए उस स्थान पर पहुंचे ,जहां माता प्रतीक्षा कर रही थी। तत्पश्चात् भगवान श्री कृष्णा और रुक्मणी माता का विवाह हुआ ।लोग बधाइयां गायें। लोगों ने उपहार दिए और भगवान श्री कृष्ण व माता को दर्शन किए। कथा के छठवें दिन मुख्य अतिथि के रूप में 21वीं वाहिनी के कमांडेंट तपेश्वर संबित रावत उपस्थित रहे ।विवाह रुक्मणी व कृष्ण विवाह को देखकर सभी भक्त झूम उठे ।विवाह में पुरुष बाराती बने थे और स्त्रियां घराती बने थे। मौके पर उपस्थित मुख्य अतिथि कमांडेंट श्री तपेश्वर सुमित रावत को रामलाल की मूर्ति दी गई। और अन्य सहयोगियों दो प्रेमनाथ तिवारी अधिवक्ता रघुनाथ प्रसाद, चंद्रशेखर द्विवेदी आदि को भगवान राम लल्ला का चित्र देकर व्यास पीठ से आशीर्वाद दिलवाया गया।




