
धोखेबाज़ को मित्र कैसे मान लें?

नेह की सुगंध का प्रबंध जो कर न सके,
तो हर एक फूल को पवित्र कैसे मान लें।
गिरे हैं तो दामन पर दाग लगा ही होगा,
शुद्ध होगा उनका चरित्र कैसे मान लें।
जिसमें से सिर्फ साज़िशों की गंध आ रही हो,
बताओ भला उसे एकता का इत्र कैसे मान लें।
जो हमारे पीठ पीछे हमारी ही बुराई करें,
बताओ उसे हम अपना मित्र कैसे मान लें।
जो सामने हँसें और पीठ में ख़ंजर उतार दें,
उनकी नज़र में वफ़ा का चित्र कैसे मान लें।
दिखावे की रौशनी से जो दिल का अंधेरा छुपाएं,
उनके खोखले उजाले को पवित्र कैसे मान लें।

