कृष्ण जन्माष्टमी व्रत कथा
*💥कृष्ण जन्माष्टमी व्रत कथा 💥*
कृष्ण जन्माष्टमी स्पेशल: कृष्ण जन्माष्टमी व्रत कथा धार्मिक मान्यताओ के अनुसार, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर व्रत रखने और कथा सुनने से पापों का नाश होता है. भक्तों को सुख, समृद्धि, यश, सौभाग्य और लंबी आयु का आशीर्वाद मिलता है. माना जाता है कि श्रद्धापूर्वक व्रत करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है.
*कृष्ण जन्माष्टमी व्रत कथा ?*
*पौराणिक कथा के अनुसार एक बार इंद्र ने कहा- हे ब्रह्मपुत्र, हे मुनियों में श्रेष्ठ, सभी शास्त्रों के ज्ञाता, हे देव, व्रतों में उत्तम उस व्रत को बताएं, जिस व्रत से मनुष्यों को मुक्ति, लाभ प्राप्त हो तथा हे ब्रह्मन्! उस व्रत से प्राणियों को भोग व मोक्ष भी प्राप्त हो जाए. इंद्र की बातों को सुनकर नारदजी ने कहा- त्रेतायुग के अन्त में और द्वापर युग के प्रारंभ समय में निन्दितकर्म को करने वाला कंस नाम का एक अत्यंत पापी दैत्य हुआ. कंस के पिता उग्रसेन अपने पुत्र की रीति-नीतियों से बेहद दुखी थे। जब उन्होंने कंस को सबक सिखाने की कोशिश की तो कंस ने पिता को गद्दी से हटाकर खुद को ही राजा घोषित कर दिया. गद्दी पर बैठने के बाद मथुरा के लोगों पर कंस ने और अधिक अत्याचार करना शुरू कर दिया।कंस भले ही बेहद अत्याचारी राजा था लेकिन अपनी बहन देवकी से वो अत्यंत प्रेम करता था. उसी ने वासुदेव से देवकी का विवाह भी तय किया और विवाह के बाद रथ पर बैठाकर देवकी को वासुदेव के घर ले जाने लगा. कंस जब देवकी और वासुदेव के साथ रथ पर बैठकर आगे बढ़ रहा था तो आकाशवाणी हुई- अरे मुर्ख जिस बहन को तू बड़े प्रेम से विदा कर रहा है उसी की आठवीं संतान तेरी मृत्यु का कारण बनेगी.इसके बाद कंस क्रोध में आ गया और उसने वासुदेव को मारने का प्रयास किया. लेकिन देवकी ने यह कहकर वासुदेव को बचा लिया कि वो अपनी हर संतान को पैदा होते ही कंस के हवाले कर देगी. इसके बाद कंस ने देवकी और वासुदेव को कारागार में डाल दिया. कंस से किए वादे के चलते एक के बाद एक 7 संतानों को देवकी ने कंस को सौंप दिया और कंस ने निर्ममता से उनकी हत्या कर दी.जब देवकी की #आठवीं संतान के पैदा होने का समय आया तो कंस ने कारागार के आसपास कड़ा पहरा लगा दिया. भगवान कृष्ण के जन्म से पहले भगवान विष्णु ने देवकी और वासुदेव के सपने में आकर उन्हें मनुष्य अवतार में आने की बात कही. साथ उन्होंने कहा कि जन्म के बाद मुझे नन्द और यशोदा के पास लालन-पालन के लिए आप छोड़ दें. जब देवकी की संतान होने वाली थी उसी समय यशोदा भी बच्चे को जन्म देने वाली थी.भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की रात्रि में देवकी ने कृष्ण को जन्म दिया. भगवान की कृपा से उस दौरान कारागार के सभी पहरेदार मूर्छित हो गए। जिसके चलते वासुदेव भगवान कृष्ण को सूप में लिटाकर उन्हें नन्द के घर ले जाने लगे. उस समय यमुनाजी पूर्ण रूप से बाढ़ग्रस्त थीं, किन्तु जब वसुदेवजी बालक कृष्ण को सूप में लेकर यमुनाजी को पार करने के लिए उतरे उसी क्षण बालक के चरणों का स्पर्श होते ही यमुनाजी अपने पूर्व स्थिर रूप में आ गईं. किसी प्रकार वसुदेवजी गोकुल पहुंचे और नंद के गृह में प्रवेश कर उन्होंने अपना पुत्र तत्काल रख दिया और उसके बदले में उनकी कन्या ले आए. वे तत्क्षण वहां से वापस आकर कंस के बंदी गृह में पहुंच गए.प्रातःकाल जब सभी राक्षस पहरेदार निद्रा से जागे तो कंस ने द्वारपाल से पूछा कि अब देवकी के गर्भ से क्या हुआ? इस बात का पता लगाकर मुझे बताओ. द्वारपालों ने महाराज की आज्ञा को मानते हुए कारागार में जाकर देखा तो वहां देवकी की गोद में एक कन्या थी. जिसे देखकर द्वारपालों ने कंस को सूचित किया, किन्तु कंस को तो उस कन्या से भय होने लगा. अतः वह स्वयं कारागार में गया और उसने देवकी की गोद से कन्या को झपट लिया और उसे एक पत्थर की चट्टान पर पटक दिया किन्तु वह कन्या विष्णु की माया से आकाश की ओर चली गई और अंतरिक्ष में जाकर विद्युत के रूप में परिणित हो गई.उसने कंस से कहा कि हे दुष्ट! तुझे मारने वाला गोकुल में नंद के गृह में उत्पन्न हो चुका है और उसी से तेरी मृत्यु सुनिश्चित है. मेरा नाम तो वैष्णवी है, मैं संसार के कर्ता भगवान विष्णु की माया से उत्पन्न हुई हूं, इतना कहकर वह स्वर्ग की ओर चली गई. उस आकाशवाणी को सुनकर कंस क्रोधित हो उठा. उसने नंदजी के गृह में पूतना राक्षसी को कृष्ण का वध करने के लिए भेजा किन्तु जब वह राक्षसी कृष्ण को स्तनपान कराने लगी तो कृष्ण ने उसके स्तन से उसके प्राणों को खींच लिया और वह राक्षसी कृष्ण-कृष्ण कहते हुए मृत्यु को प्राप्त हुई.इस तरह भगवान कृष्ण ने युवा अवस्था में कंस का वध किया और मथुरा के लोगों को उसके अत्याचार से छुटकारा दिलाया. अपने संपूर्ण जीवनकाल में भगवान कृष्ण ने कई लीलाएं की और गीता के उपदेश से दुनिया को नया ज्ञान प्रदान किया.
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी केवल एक त्यौहार नहीं….!
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी केवल एक त्यौहार मनाने का दिन नहीं है, बल्कि यह जीवन को सही ढंग से जीने और धर्म (सत्य व कर्तव्य) के मार्ग पर चलने का एक गहरा संदेश देता है।
अधर्म पर धर्म की विजय: श्रीकृष्ण का जन्म कंस के अत्याचार और पाप का अंत करने के लिए हुआ था। यह इस बात का प्रतीक है कि बुराई और असत्य चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न दिखे, अंत में जीत हमेशा सत्य, न्याय और धर्म की ही होती है।
निष्काम कर्म (कर्मयोग): भगवद्गीता के माध्यम से श्रीकृष्ण का सबसे बड़ा संदेश है कि मनुष्य को केवल अपने कर्तव्य (कर्म) पर ध्यान देना चाहिए, फल की चिंता नहीं करनी चाहिए। परिणाम की परवाह किए बिना निस्वार्थ भाव से अपना सर्वश्रेष्ठ देना ही सच्चा कर्मयोग है।
विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य और मुस्कान: श्रीकृष्ण का जन्म कारागार (जेल) में हुआ, जन्म लेते ही माता-पिता से बिछड़ना पड़ा और बचपन से ही कई तरह के संकटों का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने हर परिस्थिति को स्वीकार किया और हमेशा मुस्कुराते रहे। यह संदेश देता है कि जीवन की हर कठिन परिस्थिति का सामना धैर्य, सकारात्मकता और आनंद के साथ करना चाहिए।
प्रेम और समभाव: बाल्यावस्था और गोकुल में राधा-कृष्ण का प्रेम, गोपियों के साथ रास और ग्वालों के साथ मित्रता यह सिखाती है कि ईश्वर किसी भेदभाव के बिना केवल सच्चे प्रेम और भक्ति से प्राप्त होते हैं।
सच्ची मित्रता का मूल्य: श्रीकृष्ण और सुदामा की कथा यह सिखाती है कि सच्चे प्रेम और मित्रता में अमीर-गरीब या पद का कोई भेद नहीं होता। अपने मित्र के प्रति हमेशा निस्वार्थ और दयालु होना चाहिए।
परिस्थितियों के अनुसार मार्ग चुनना: श्रीकृष्ण एक व्यावहारिक और कूटनीतिज्ञ मार्गदर्शक भी थे। महाभारत में उन्होंने सिखाया कि धर्म और न्याय की रक्षा के लिए यदि नीतियां बदलनी पड़ें, तो पीछे नहीं हटना चाहिए।
कृष्ण जन्माष्टमी का संदेश यही है कि मनुष्य अपने अंदर की नकारात्मकता (अहंकार, क्रोध, लालच) रूपी कंस का वध करे और अपने जीवन में प्रेम, कर्तव्य, ज्ञान और सकारात्मकता रूपी श्रीकृष्ण को धारण करे।
*आरती श्री कृष्णजी की*
*आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥*
*गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला ।*
*श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला ।*
*गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली ।*
*लतन में ठाढ़े बनमाली, भ्रमर सी अलक,*
*कस्तूरी तिलक,चंद्र सी झलक,*
*ललित छवि श्यामा प्यारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥*
*आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥*
*कनकमय मोर मुकुट बिलसै,देवता दरसन को तरसैं ।*
*गगन सों सुमन रासि बरसै ।*
*बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग,*
*ग्वालिन संग, अतुल रति गोप कुमारी की,*
*श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥*
*आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥*
*जहां ते प्रकट भई गंगा, सकल मन हारिणि श्री गंगा ।*
*स्मरन ते होत मोह भंगा।*
*बसी शिव सीस, जटा के बीच, हरै अघ कीच,*
*चरन छवि श्रीबनवारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥*
*आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥*
*चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृंदावन बेनू ।*
*चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू।*
*हंसत मृदु मंद, चांदनी चंद, कटत भव फंद,*
*टेर सुन दीन दुखारी की,*
*श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥*
*आरती कुंजबिहारी की,*
*श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥*
राधे राधे, जय श्री कृष्ण 🌺🌺🌺🌺🌺🌺



